
किस कदर बौना दीखता है
मेरा शहर
जब पैदा होता है
कोई गुलिवर यहाँ
और बौने दीख पड़ते हैं
मेरे शहर के लोग ।
पहले तो देखते हैं
उसे फटी-फटी आखों से
और जब छा जाता है
गुलिवर का आकर्षक व्यक्तित्व
उनके दिलोदिमाग पर
भूल जाते हैं अपने आपको
मेरे शहर के लोग ।
टूटती है जब उनकी तंद्रा
आगे बढ़ गुलिवर को
बाँहों में भर लेना चाहते है
मेरे शहर के लोग ।
लेकिन गुलिवर समां नही पाता
उनकी नन्हीं बाँहों की परिधि में
खीज जाते हैं अपने आप पर
mere shahar ke लोग ।
खीज मिटाने को पत्थर मारते हैं उसे
बेचारा गुलिवर
घबराकर प्रश्निल निगाहों से
खोजता है सर छुपाने को एक छत
लेकिन शहर तो बौनों का है
खुश हो जाते हैं मेरे शहर के लोग।
लहुलुहान गुलिवर कहता है
कोई बात नही
पत्थर मारने वाले हैं मेरे शहर के लोग।
अंत में मर भी जाता है यह सोचकर
कुछ दिन और जी सकेंगे
मेरे शहर के लोग।
किंतु मरे हुए गुलिवर का भी
पिंड नही छोड़ते
मेरे शहर के लोग ।
नन्हीं -नन्हीं सीढियां लगाकर
उसकी लाश पर चढ़ जाते हैं
मेरे शहर के लोग।
चलो अच्छा हुआ
कुछ तो ऊँचे हो गए
mere लोग.
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